Friday, February 6, 2026
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New Year के लिए 1 जनवरी का दिन ही क्यों होता है खास? कौन था वो शख्स जिसने इस परंपरा की रखी थी नींव

2025 को अलविदा कर हम सभी 2026 में प्रवेश कर चुके हैं। नए साल का आना एक नई सीढ़ी या फिर जीवन में आने वाले किसी नए पड़ाव जैसा है। हर बार नए साल को लेकर हर किसी के मन में एक अजब उत्साह रहता है, लेकिन इसके साथ ही कई लोगों को बार-बार एक ही सवाल परेशान करने लगता है कि आखिर 1 जनवरी को ही नया साल क्यों मनाया गया ? या फिर इसकी शुरुआत कब, किसने और कैसे की?

इसके साथ ही अगर किसी को इतिहास के बारे में जानकारी है भी तो वो इस सोच में रहता है कि आखिर भारत ने अंग्रेजी नववर्ष को ही क्यों स्वीकारा और क्यों अपनी बरसों से चली आ रही परंपरा को बदल डाला? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो वाकई में एक आम इंसान जानने की इच्छा रखता है। आज के इस लेख को पढ़कर आपको इन सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे।

1 जनवरी का ही दिन कैसे बना खास ?

1 जनवरी को नया साल मनाने की परंपरा की नींव रोम के राजा जूलियस सीज़र ने 45 ईसा पूर्व में रखी थी, जिन्होंने चंद्रमा के स्थान पर सूर्य पर आधारित जूलियन कैलेंडर की स्थापना की थी। यह दिन इसलिए खास है क्योंकि जनवरी का नाम रोमन देवता जैनसके नाम पर रखा गया है, जिनके दो चेहरे बीते हुए कल और आने वाले भविष्य की ओर देखते हैं, जो नई शुरुआत का प्रतीक माने जाते हैं। बाद में 1582 में पोप ग्रेगोरी XIII द्वारा ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किए जाने के बाद 1 जनवरी को वैश्विक स्तर पर नए साल के रूप में स्थाई मान्यता मिल गई।

ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से दुनिया मनाती है नया साल

ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत बेहद प्राचीन है। इस कैलेंडर की शुरुआत 438 साल पहले 15 अक्टूबर, 1582 को हुई थी। यही वो कैलेंडर है जिसे दुनिया में व्यापक रूप से माना जाता है। इस कैलेंडर को मूल रूप से पोप ग्रेगरी XIII ने 1582 में जूलियन कैलेंडर की खामियों को दूर करने के लिए पेश किया था।

दुनियाभर में कई अलग-अलग तरह के कैलेंडर अपनाए जाते हैं। देखा जाए तो एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 36 तरह के प्राचीन कैलेंडर माने जाते हैं। इनमें से अधिकांश कैलेंडर ऐसे हैं जिन्हें आज के समय में प्रचलन से बाहर किया गया है। भारत के अलावा कई अन्य देशों में अलग-अलग तरह के कैलेंडरों का चलन है। लेकिन फिर भी दुनियाभर में ग्रेगेरियन कैलेंडर के हिसाब से नया साल 1 जनवरी को ही मनाया जाता है।

क्या कहता है ग्रेगोरियन कैलेंडर का इतिहास ?

कैलेंडर का इतिहास बहुत पुराना है। समय-समय पर शासक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आते गए और उन्होंने अपना राज चलाने के साथ-साथ कैलेंडर भी चलवाए और उन्हें दूसरे देशों में फैलाने का प्रयास किया। इतने समय से जो ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाने की परंपरा चली आ रही है, वो भी कई बार संशोधित हुआ था। इसी से संबंधित पहले कैलेंडर की शुरुआत रोमन साम्राज्य में हुई थी। एक समय था जब रोम कैलेंडर का ही प्रचलन था, फिर रोम के शासक जूलियस सीजर ने इसमें बदलाव कर जूलियन कैलेंडर चलाया।

ये जूलियन कैलेंडर यूरोप में कई सदियों तक चला। इस कैलेंडर के इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि, ये कैलेंडर एक साल में 365.25 दिन का था। समय जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया तो इसमें उतार चढ़ाव नजर आने लगा। इस कैलेंडर के अंदर वास्तव में 365.24219 दिन होने से इसमें हर 128 साल में एक दिन का फर्क नजर आने लगा, और ऐसे ही समय के आगे बढ़ने के साथ-साथ इसमें 15 शताब्दियों के बाद यह अंतर 11 दिन का हो गया था। इन सभी असामान्य चीज़ों को देखते हुए सन् 1582 में रोम के पोप ग्रेगोरी 13वें ने इस कैलेंडर में सुधार किया तभी से इस कैलेंडर को ग्रेगोरियन कैलेंडर का नाम मिल गया।

भारत ने इसे कैसे अपनाया ?

16वीं सदी के बाद से यूरोप से लोग दुनिया भर में जाने लगे वहां पर उपनिवेशन बनाने लगे. उन्होंने अफ्रीका, एशिया, उत्तर एवं दक्षिण अमिरेका में ग्रेगोरियन कैलेंडर को चला दिया. 18वीं और 19वीं सदी के आते-आते यूरोपीय शक्ति खासतौर से ईसाई धर्म के शासकों का पूरी दुनिया पर वर्चस्व हो गया जिसकी वजह से ग्रेगोरियन कैलेंडर दुनिया के अधिकांश देशों में अलग-अलग समय पर अपनाया जा चुका था. 20वीं सदी में दुनिया के देशों का आपस में व्यापार बढ़ता गया और इसके लिए उन्हें ग्रेगोरियन कैलेंडर अपनाना सुविधाजनक लगने लगा.

भारत में ब्रिटेन ने यह कैलेंडर 1752 में लागू किया था. तब से सभी सरकारी कामकाज ग्रेगोरियन कैलेंडर में ही हो रहे हैं. वहीं आजादी के समय भी कैलेंडर को जारी रखने या उसकी जगह हिंदू कैलेंडर को अपनाए जाने पर गहन मंथन हुआ. लेकिन आखिर में जाकर भारत सरकार ने ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ- हिंदू विक्रम संवत को भी अपना लिया, पर सरकारी कामकाज ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार ही होते हैं.

ग्रेगोरियन कैलेंडर की अजीब बात यह है कि इस कैलेंडर में हर महीने में दिन बराबर नहीं है. इसमें 30 दिन वाले चार महीने, 31 दिन वाले छह महीने और फरवरी के महीने में 28 दिन होते हैं. हर तीन साल बाद चौथे साल एक पूरा दिन जोड़ा जाता है जो फरवरी में होता है. इसे लीप वर्ष कहते हैं. इस साल फरवरी का महीना 28 की जगह 29 दिन की होता है.

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