Friday, February 6, 2026
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बाबा साहब ने अपने अंतिम वर्षों में बौद्ध धर्म क्यों अपनाया? जानें वजह

भारत के संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के महान योद्धा डॉ. भीमराव आंबेडकर की आज 70वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है। बाबा साहब ने अपने जीवन में गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों को समान अधिकार दिलाने के लिए लगातार संघर्ष किया। उन्होंने अपना पूरा जीवन जातिगत भेदभाव और असमानता को खत्म करने में समर्पित किया। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला लिया और इसके पीछे गहरा सामाजिक व दार्शनिक कारण था।

अंबेडकर ने क्यों छोड़ा हिंदू धर्म?

डॉ. भीमराव आंबेडकर बचपन से ही जाति प्रथा और भेदभाव का शिकार रहे थे। उनके साथ बचपन में स्कूल में पानी तक नहीं छूने दिया जाता था, क्योंकि वे “अछूत” माने जाते थे। इस कड़वे अनुभव ने उनके भीतर गहरा विद्रोह पैदा किया और उन्होंने ठान लिया कि समाज की वर्ण व्यवस्था को खत्म करके एक समान और न्यायपूर्ण समाज बनाना ही उनका उद्देश्य होगा। उन्होंने 13 अक्टूबर 1935 को एक सार्वजनिक घोषणा की “मैं हिंदू के रूप में जन्मा हूं, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।”

क्यों अपनाया बौद्ध धर्म?

डॉ. भीमराव आंबेडकर का कहना था कि धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं। उनके अनुसार, एक धर्म तभी सार्थक है जब वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की शिक्षा दे, लेकिन हिंदू धर्म की जातिगत व्यवस्था में इन तीनों का अभाव था। इसी सोच के कारण 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने अपने 3 लाख 65 हजार अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया।

बाबा साहब के बौद्ध धर्म अपनाने का मुख्य कारण

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर हिंदू धर्म में छुआछूत और जातिप्रथा को खत्म करने की कोशिश की, लेकिन जब उन्हें लगा कि इन कुरीतियों को समाप्त करना संभव नहीं है, तब उन्होंने धर्म परिवर्तन को ही अंतिम समाधान माना। उन्होंने अपने एक भाषण में कहा था कि “अगर हम सम्मानजनक जीवन और समान अधिकार चाहते हैं, तो हमें खुद अपनी मदद करनी होगी। इसके लिए धर्म परिवर्तन ही एक रास्ता है।” डॉ. भीमराव आंबेडकर ने बौद्ध धर्म इसलिए चुना क्योंकि इसमें प्रज्ञा, करुणा और समानता की शिक्षा दी गई है। यह धर्म न केवल सामाजिक समानता पर आधारित है, बल्कि यह अंधविश्वास और ऊंच-नीच की भावना से भी मुक्त है।

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