Sunday, February 8, 2026
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मनरेगा की जगह ‘जी राम जी’ योजना की चर्चाएं तेज, सरकार लाने वाली है नया बिल, आखिर क्यों है ये खास ?

ग्रामीण भारत में रहने वाले गरीब और मेहनतकश परिवारों के लिए मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि आजीविका का मजबूत सहारा बन चुकी है। गांवों में बेरोजगारी और गरीबी से मुकाबले के लिए इसे सबसे प्रभावी सरकारी कार्यक्रम माना जाता है। दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना के रूप में पहचान बना चुकी मनरेगा हर साल करोड़ों ग्रामीणों को काम और आमदनी की सुरक्षा देती है। यह योजना रोजगार उपलब्ध कराने के साथ-साथ गांवों में बुनियादी ढांचे के विकास में भी अहम भूमिका निभाती है। अब केंद्र सरकार इस योजना को नए स्वरूप और नए नाम के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

क्या है इसका उद्देश्य ?

प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि इसका मकसद ‘विकसित भारत 2047’ के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप एक मजबूत ग्रामीण विकास ढांचा खड़ा करना है। इसके तहत अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के मजदूरी आधारित रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाएगी। योजना का लक्ष्य ग्रामीण आबादी को सशक्त बनाते हुए एक समृद्ध और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत का निर्माण करना है।

‘जी राम जी’ बिल की खास बातें

नए कानून के तहत अधिसूचित ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले प्रत्येक ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जाएगा। मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या फिर काम पूरा होने के अधिकतम 15 दिनों के भीतर किया जाएगा। यदि आवेदन के 15 दिन बाद भी काम उपलब्ध नहीं कराया गया, तो संबंधित परिवार को बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान रखा गया है।

सराकार के इस नए बिल के अनुसार, कार्यों की योजना की शुरुआत विकसित ग्राम पंचायत योजना से होगी, जिसे आगे चलकर ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर समेकित किया जाएगा। इन योजनाओं को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक से जोड़ा जाएगा।

कार्यों का चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है-

जल सुरक्षा

मुख्य ग्रामीण अवसंरचना

आजीविका से जुड़ी अवसंरचना

आपदा-रोधी ढांचा

खेती के मौसम में काम पर रोक

खेती-बाड़ी के प्रमुख समय में इस योजना के तहत अधिकतम 60 दिनों से ज्यादा कार्य नहीं कराया जाएगा, हालांकि प्राकृतिक आपदाओं या विशेष परिस्थितियों में इसमें छूट दी जा सकती है।

पारदर्शिता और निगरानी पर जोर

योजना को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए सरकार ने कुछ आसान लेकिन सख्त नियम तय किए हैं। इसमें काम करने वालों की पहचान बायोमेट्रिक तरीके से होगी और काम की जगह की जियो-टैगिंग की जाएगी। पूरी जानकारी देखने के लिए डिजिटल एमआईएस डैशबोर्ड बनाया जाएगा और हर हफ्ते काम का सार्वजनिक विवरण जारी किया जाएगा।

फंडिंग और खर्च का ढांचा

यह योजना केंद्र प्रायोजित होगी। वित्तीय हिस्सेदारी इस प्रकार तय की गई है-

उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10

अन्य राज्यों के लिए 60:40

बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता योजना पर अनुमानित वार्षिक खर्च ₹1.51 लाख करोड़ बताया गया है, जिसमें से केंद्र सरकार का हिस्सा करीब ₹95,692 करोड़ रुपये होगा।

कुल मिलाकर, सरकार का यह कदम मनरेगा को नए विजन और व्यापक दायरे के साथ आगे ले जाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, जिससे ग्रामीण रोजगार और विकास को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

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