Monday, February 9, 2026
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Lohri 2026: आज धूमधाम से मनाया जाएगा लोहड़ी का पर्व, जानें महत्व, मुहूर्त और पूजन विधि

आज देश के कई हिस्सों, खासकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली-NCR में लोहड़ी का पर्व पूरे उत्साह और परंपरागत उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। लोहड़ी उत्तर भारत के प्रमुख शीतकालीन त्योहारों में से एक है, जो ठंड के मौसम के समापन और लंबे व गर्म दिनों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व खासतौर पर कृषि परंपराओं से जुड़ा हुआ है और किसानों, नवविवाहितों तथा नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए विशेष महत्व रखता है।

अलाव, लोकगीत और सामूहिक उत्सव

लोहड़ी के दिन शाम होते ही लोग घरों के आंगन या खुले मैदानों में अलाव जलाते हैं। अलाव के चारों ओर परिक्रमा करते हुए तिल, मूंगफली, रेवड़ी, गुड़ और मक्के की बालियां अग्नि को अर्पित की जाती हैं। लोकगीत गाए जाते हैं, ढोल की थाप पर भांगड़ा-गिद्धा होता है और सामूहिक मेल-जोल के साथ यह पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।

लोहड़ी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

लोहड़ी का पर्व हर वर्ष 13 जनवरी को मनाया जाता है। इस वर्ष भी लोहड़ी आज मनाई जा रही है। पवित्र अग्नि प्रदोष काल में जलाना शुभ माना जाता है। आज लोहड़ी का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 34 मिनट से रात 8 बजकर 12 मिनट तक रहेगा।

लोहड़ी का महत्व

लोहड़ी को शीतकालीन संक्रांति से जोड़ा जाता है, जिसमें सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देवता की आराधना कर समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता की कामना की जाती है। यह पर्व खास तौर पर उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण होता है जो विवाह या संतान जन्म के बाद पहली लोहड़ी मना रहे होते हैं। इसे नए आरंभ और खुशहाल जीवन का प्रतीक माना जाता है।

रीति-रिवाज और पूजन विधि

लोहड़ी के दिन साफ वस्त्र पहनकर परिवार के सभी सदस्य अग्नि के चारों ओर एकत्र होते हैं। लकड़ियों से अग्नि प्रज्वलित की जाती है और उस पर गंगाजल छिड़का जाता है। इसके बाद कुमकुम, अक्षत और हल्दी अर्पित की जाती है। परिक्रमा करते हुए गजक, मूंगफली, तिल के लड्डू, मक्का और गेहूं की बालियां अग्नि में डाली जाती हैं। मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और जीवन में सुख-शांति आती है।

दुल्ला भट्टी की कहानी

लोहड़ी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा दुल्ला भट्टी की है। कहा जाता है कि मुगल काल में अकबर के शासन के दौरान दुल्ला भट्टी पंजाब के लोकनायक थे। उन्होंने उस समय लड़कियों को शोषण से बचाया और उनकी शादी सम्मानपूर्वक करवाई। उनकी बहादुरी की गाथा लोहड़ी के लोकगीतों में आज भी गाई जाती है। इसी कारण दुल्ला भट्टी को नायक के रूप में याद किया जाता है।

परंपरा और संस्कृति का उत्सव

समय के साथ लोहड़ी केवल कृषि पर्व ही नहीं, बल्कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के कुछ हिस्सों में एक सांस्कृतिक उत्सव के रूप में स्थापित हो गई है। पतंगबाजी, पारंपरिक व्यंजन और सामूहिक उल्लास इस पर्व को और खास बनाते हैं।

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