Saturday, February 7, 2026
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चीन को चित करने की तैयारी में भारत…सुरंगों और एयरस्ट्रिप का चल रहा निर्माण, बॉर्डर तक हथियारों की पहुंच होगी आसान

हिमालयी क्षेत्र में चीन के साथ किसी भी संभावित टकराव की स्थिति से निपटने के लिए भारत बड़े पैमाने पर सैन्य ढांचागत विकास में निवेश कर रहा है। सड़कों, सुरंगों और हवाई पट्टियों के निर्माण पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। यह खुलासा अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की एक रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प के बाद भारत ने इस दिशा में तेजी से काम शुरू किया। उस घटना ने करीब 2200 मील लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की गंभीर कमजोरियों को सामने ला दिया था।

चीन से पिछड़ा भारत का बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर

दशकों से चीन ने अपनी सीमा से सटे इलाकों में सड़कों और रेल नेटवर्क का मजबूत जाल बिछा रखा है। इसके उलट, भारत पहाड़ी और दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों और संसाधनों को तेजी से पहुंचाने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे के निर्माण में पीछे रह गया था।

चीन घंटों में, भारत दिनों में पहुंचाता है मदद

2020 की झड़प के दौरान करीब 14,000 फीट की ऊंचाई पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुआ था, जिसमें डंडों और कांटेदार तारों से लिपटे हथियारों का इस्तेमाल किया गया। सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बेहतर कनेक्टिविटी के कारण चीन कुछ ही घंटों में अतिरिक्त सैनिक और संसाधन पहुंचाने में सक्षम था, जबकि भारत को खराब या लगभग न के बराबर सड़कों की वजह से उसी इलाके में अतिरिक्त बल भेजने में करीब एक हफ्ता लग गया। लद्दाख के उत्तरी क्षेत्र में पूर्व ऑपरेशनल लॉजिस्टिक्स प्रमुख मेजर जनरल अमृत पाल सिंह ने WSJ से कहा कि इस घटना के बाद भारत को अपनी पूरी रणनीति पर दोबारा सोचने की जरूरत महसूस हुई।

11,500 फीट की ऊंचाई पर बन रही जोजिला सुरंग

भारत के नॉर्दर्न कमांड के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने बताया कि इन परियोजनाओं का उद्देश्य ऊंचाई पर स्थित सैन्य चौकियों को आसपास की नागरिक बस्तियों से जोड़ना है, खासकर उन इलाकों को जो सर्दियों में पूरी तरह कट जाते हैं। इनमें सबसे अहम परियोजनाओं में जोजिला सुरंग शामिल है, जिसे उत्तरी भारत के पहाड़ी इलाके में लगभग 11,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया जा रहा है। यह परियोजना 2020 के संघर्ष के कुछ महीनों बाद शुरू हुई थी और इसकी लागत 750 मिलियन डॉलर (करीब 6,734 करोड़ रुपये) से अधिक है। इसे 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

सीमा चौकियों तक सप्लाई होगी आसान

करीब 9 मील (15 किलोमीटर) लंबी यह सुरंग लद्दाख में सीमा चौकियों तक रसद पहुंचाने की चुनौती को काफी हद तक आसान बना देगी। भारी बर्फबारी के कारण यहां कई चौकियां साल के लगभग छह महीने सप्लाई लाइन से कटी रहती हैं। फिलहाल, सामान पहले ट्रक या ट्रेन के जरिए जम्मू-कश्मीर के नजदीकी डिपो तक लाया जाता है। वहां से सेना के काफिले इसे लेह पहुंचाते हैं। इसके बाद छोटी गाड़ियां खराब रास्तों से आगे बढ़ती हैं और अंत में पोर्टर व खच्चर समुद्र तल से करीब 20,000 फीट की ऊंचाई तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं।

घंटों का सफर होगा मिनटों में

एक सैनिक को हर महीने औसतन 220 पाउंड सामग्री की जरूरत होती है, जिसमें खाना, कपड़े और रोजमर्रा की चीजें शामिल हैं। करीब 30 सैनिकों वाली एक चौकी में रोजाना लगभग 13 गैलन ईंधन की खपत होती है, जिसे कंधों पर ढोकर ऊपर पहुंचाया जाता है। जोजिला सुरंग के चालू होने से सप्लाई सिस्टम में बड़ा बदलाव आएगा।

इसके बनने के बाद श्रीनगर और लद्दाख के बीच कुछ हिस्सों में यात्रा का समय तीन घंटे से घटकर महज 20 मिनट रह जाएगा। हालांकि, इस परियोजना में सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती सुरंग के भीतर पर्याप्त वेंटिलेशन सुनिश्चित करना है, ताकि काम कर रहे मजदूरों और भविष्य में डीजल से चलने वाले सैन्य ट्रकों के लिए सुरक्षित वातावरण बना रहे। इस परियोजना में फिलहाल 1,000 से ज्यादा कर्मचारी काम कर रहे हैं।

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