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संगीतकार बनना था, संन्यासी बन गए, जानें कैसे नरेंद्रनाथ से स्वामी विवेकानंद बने?
Monday, February 9, 2026
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संगीतकार बनना था, संन्यासी बन गए, जानें कैसे नरेंद्रनाथ से स्वामी विवेकानंद बने?

स्वामी विवेकानंद केवल एक संत या दार्शनिक नहीं थे, बल्कि वे ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने भारत के युवाओं को आत्मविश्वास, आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता का मंत्र दिया। 12 जनवरी 1863 को जन्मे विवेकानंद ने कम उम्र में ही ऐसा वैचारिक प्रभाव छोड़ा कि आज भी उनके विचार उतने ही प्रासंगिक लगते हैं। आमतौर पर हम उनके शिकागो भाषण, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य होने और वेदांत दर्शन के बारे में जानते हैं, लेकिन उनकी ज़िंदगी से जुड़े कई ऐसे किस्से हैं जो कम चर्चित होने के बावजूद बेहद प्रेरक हैं।

आइए जानते हैं स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़े 10 अनसुने और प्रेरणादायक किस्से।

  • बचपन में भगवान से सीधा सवाल पूछने वाला बालक

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही तर्कशील और निडर स्वभाव के थे। बाल्यावस्था में ही वे साधुओं और पंडितों से एक ही सवाल बार-बार पूछते थे क्या आपने भगवान को देखा है? अधिकतर लोग गोलमोल जवाब देते, लेकिन नरेंद्र को संतोष नहीं होता। यही सवाल उन्हें रामकृष्ण परमहंस तक ले गया। जब रामकृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में कहा हां, मैंने भगवान को वैसे ही देखा है जैसे तुम्हें देख रहा हूं, तो यही उत्तर नरेंद्र के जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ।

सवाल पूछने से मत डरिए, सच्चा ज्ञान जिज्ञासा से ही जन्म लेता है।

  • संगीतकार बनने का सपना, संन्यास की ओर कदम

बहुत कम लोग जानते हैं कि नरेंद्र नाथ एक बेहतरीन गायक थे। उन्हें शास्त्रीय संगीत और बंगाली भजनों में गहरी रुचि थी। वे अक्सर रामकृष्ण परमहंस के लिए भजन गाया करते थे। किसी ने उनसे कहा कि वे बड़े संगीतकार बन सकते हैं, तो उन्होंने उत्तर दिया, अगर संगीत आत्मा को ईश्वर से जोड़ दे, तो वही मेरा संगीत है। यही सोच आगे चलकर उन्हें संन्यास और सेवा के मार्ग पर ले गई।

प्रतिभा का सर्वोच्च उपयोग वही है जो आत्मा और समाज दोनों का कल्याण करे।

  • पिता की मृत्यु और गरीबी के कठिन दिन

कॉलेज के दिनों में ही नरेंद्र के पिता का अचानक निधन हो गया। परिवार आर्थिक संकट में डूब गया। कई बार घर में भोजन तक नहीं होता था। नरेंद्र नौकरी की तलाश में भटकते रहे, लेकिन निराशा हाथ लगी। अंत में वे रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। गुरु ने कहा मां काली से मांग कर देखो। मंदिर में जाते समय वे अपने लिए कुछ मांग ही नहीं पाए और बस इतना कहा मां, मुझे विवेक और वैराग्य दो।

सच्चा बलिदान वही है जिसमें व्यक्ति अपने दुख से ऊपर उठ जाता है।

  • संन्यास के बाद नाम बदलने की कहानी

संन्यास लेने के बाद नरेंद्रनाथ को नया नाम मिला विवेकानंद। विवेक यानी सही और गलत में भेद करने की शक्ति, और आनंद यानी आत्मिक सुख। यह नाम उनके पूरे जीवन-दर्शन और उद्देश्य का प्रतीक बन गया।

नाम नहीं, उद्देश्य व्यक्ति को महान बनाता है।

  • भारत भ्रमण और भूखे साधु का अपमान

भारत भ्रमण के दौरान एक गांव में भिक्षा मांगते समय लोगों ने उन्हें अपमानित करते हुए भगा दिया। यह घटना उन्हें भीतर तक झकझोर गई। उन्होंने कहा जब तक भारत के लोग भूखे हैं, मुझे मोक्ष नहीं चाहिए। यही भावना आगे चलकर रामकृष्ण मिशन की सेवा-आधारित सोच की नींव बनी।

अपमान से टूटिए नहीं, उसे अपने उद्देश्य की शक्ति बनाइए।

  • शिकागो जाने से पहले जूते तक नहीं थे

1893 में शिकागो जाने से पहले विवेकानंद के पास न पैसे थे, न ढंग के कपड़े। कई लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। राजा अजीत सिंह ने उनकी सहायता की, जिससे उनकी यात्रा संभव हो सकी। विवेकानंद का विश्वास था अगर एक व्यक्ति भी आपके विचारों पर भरोसा कर ले, तो रास्ता बन जाता है।

विश्वास, संसाधनों से कहीं बड़ा होता है।

  • शिकागो भाषण के बाद भी अपमान

ऐतिहासिक शिकागो भाषण के बाद भी एक बार साधारण वेशभूषा के कारण उन्हें होटल में प्रवेश नहीं मिला। बाद में आयोजकों ने माफी मांगी। विवेकानंद ने शांति से कहा सम्मान कपड़ों से नहीं, विचारों से मिलता है।

बाहरी पहचान नहीं, आंतरिक मूल्य महत्वपूर्ण होते हैं।

  • अमेरिका में नस्लभेद पर बेबाक राय

अमेरिका में रहते हुए विवेकानंद ने रंग और नस्ल के आधार पर भेदभाव की खुलकर आलोचना की। उन्होंने कहा जो समाज मनुष्य को मनुष्य नहीं मानता, वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता। उस दौर में ऐसा कहना साहस का प्रतीक था।

सत्य बोलने का साहस ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

  • 39 वर्ष की आयु और भविष्य का पूर्वाभास

स्वामी विवेकानंद ने पहले ही कह दिया था कि वे 40 वर्ष से अधिक नहीं जिएंगे। 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में ध्यानावस्था में उनका देहांत हो गया।

जीवन की लंबाई नहीं, उसकी गहराई मायने रखती है।

  • युवाओं के लिए अमर संदेश

विवेकानंद का सबसे प्रसिद्ध संदेश आज भी युवाओं को दिशा देता है “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” वे मानते थे कि युवा ही राष्ट्र की आत्मा हैं। इसी कारण 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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