Sunday, February 8, 2026
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12 साल से कोमा में हरीश, 31 साल की उम्र में SC करेगा इच्छामृत्यु पर सुनवाई… 

पिछले 12 साल से कोमा में पड़े गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को लेकर अब देश की सबसे बड़ी अदालत एक बेहद संवेदनशील फैसले की ओर बढ़ रही है। गुरुवार, 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर अहम सुनवाई होनी है कि हरीश को पैसिव यूथेनिशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी जाए या नहीं।

परिजनों से मिलकर जजों ने जानी जमीनी हकीकत

इस मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मंगलवार को कोर्ट के कमेटी रूम में हरीश के माता-पिता से मुलाकात की। पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ किया था कि किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले वह परिवार से प्रत्यक्ष बातचीत कर वास्तविक स्थिति को समझना चाहती है। पीठ ने इस केस में विशेषज्ञ डॉक्टरों के दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड की रिपोर्टों को भी रिकॉर्ड पर लिया है।

मेडिकल रिपोर्ट में भी नहीं दिखी सुधार की उम्मीद

सूत्रों के मुताबिक, कोर्ट के समक्ष पेश मेडिकल रिपोर्टों में हरीश के ठीक होने की संभावना बेहद कम बताई गई है। परिवार की ओर से पैरवी कर रहे वकील मनीष जैन ने बताया कि हरीश पिछले करीब साढ़े 12 वर्षों से बिस्तर से उठ नहीं पाया है।

उसे ट्यूब के जरिए तरल आहार दिया जा रहा है। वह न बोल सकता है और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया दे पाता है। आंखें कभी-कभार खुलती हैं, लेकिन उनमें भी कोई हरकत नहीं होती।

लंबे समय से बिस्तर पर हरीश

लगातार बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से हरीश की पीठ पर गहरे घाव बन चुके हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, उसका शरीर लगभग निष्क्रिय अवस्था में है और मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंच चुका है।

पढ़ाई के दौरान हुआ था दर्दनाक हादसा

हरीश चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई कर रहा था, तभी 20 अगस्त 2013 को वह चौथी मंजिल से गिर गया या गिराया गया। इस हादसे में उसके सिर में गंभीर चोट आई, जिसके बाद वह कोमा में चला गया। तब से लेकर आज तक उसकी स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हो सका।

माता-पिता ने लगाई गरिमापूर्ण मौत की गुहार

करीब तीन साल पहले हरीश के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका कहना है कि जब बेटे को गरिमापूर्ण जीवन नहीं मिल सका, तो कम से कम उसे सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार दिया जाए।

क्या होती है इच्छामृत्यु ?

इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी असाध्य रूप से बीमार व्यक्ति को उसकी पीड़ा से राहत दिलाने के लिए जीवन का अंत करना। यह दो प्रकार की होती है-

एक्टिव यूथेनिशिया (सक्रिय): इसमें डॉक्टर दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु सुनिश्चित करते हैं।

पैसिव यूथेनिशिया (निष्क्रिय): इसमें जीवन रक्षक उपचार बंद कर दिया जाता है, जैसे वेंटिलेटर हटाना या दवाएं रोक देना।

गौरतलब है कि साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनिशिया को कानूनी मंजूरी दी थी, लेकिन हर मामले में अंतिम फैसला अदालत की अनुमति से ही होता है। अब देखना यह होगा कि गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट हरीश की तकलीफ और परिवार की भावनाओं को देखते हुए क्या निर्णय देता है।

यह भी पढ़ें : ASP अनुज चौधरी के खिलाफ दर्ज हो FIR…चंदौसी कोर्ट का सख्त आदेश, SP बोले…

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