Tuesday, February 10, 2026
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MahaKumbh2025: हर 12 साल में क्यों उमड़ती है करोड़ों की श्रद्धा ? जानें सनातन धर्म में इसका महत्व

प्रयागराज में आयोजित होने वाला महाकुंभ विश्वप्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक महोत्सव है, जो हर 12 साल में एक बार आयोजित होता है। 2025 में महाकुंभ का आयोजन 13 जनवरी से शुरू होकर 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर समाप्त होगा। इस महापर्व में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु पुण्य स्नान और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए प्रयागराज पहुंचते हैं। आइए जानते हैं महाकुंभ का धार्मिक महत्व और इसकी विशेषताएं।

महाकुंभ का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में महाकुंभ का विशेष धार्मिक महत्व है, जिसकी उत्पत्ति समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तो उस मंथन से अमृत कलश निकला था। इस अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष हुआ। संघर्ष के दौरान अमृत की कुछ बूंदें धरती के चार स्थानों – प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक – पर गिरीं। इन्हीं स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

‘कुंभ’ का अर्थ कलश (घड़ा) होता है, लेकिन यह साधारण कलश नहीं बल्कि अमृत कलश का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि महाकुंभ के दौरान इन स्थानों पर स्नान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं।

महाकुंभ 2025 में शाही स्नान की तिथियां

महाकुंभ में शाही स्नान का विशेष महत्व होता है। शाही स्नान के दौरान साधु-संतों, अखाड़ों और लाखों श्रद्धालुओं का पवित्र नदियों में स्नान महोत्सव का मुख्य आकर्षण होता है। 2025 महाकुंभ के प्रमुख शाही स्नान की तिथियां इस प्रकार हैं:

  1. पहला शाही स्नान: 14 जनवरी 2025 (मकर संक्रांति)
  2. दूसरा शाही स्नान: 29 जनवरी 2025 (मौनी अमावस्या)
  3. तीसरा शाही स्नान: 14 फरवरी 2025 (बसंत पंचमी)
  4. चौथा शाही स्नान: 26 फरवरी 2025 (महाशिवरात्रि)

शाही स्नान का महत्व

हिंदू धर्म में पवित्र नदियों में स्नान की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाकुंभ के दौरान शाही स्नान का महत्व और बढ़ जाता है। माना जाता है कि इन तिथियों पर गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी और शिप्रा नदियों का जल अमृत के समान पवित्र हो जाता है। शाही स्नान करने से व्यक्ति को न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि भी प्राप्त होती है।

प्रयागराज का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यहां त्रिवेणी संगम है – गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम। इस संगम में स्नान करना हर श्रद्धालु के लिए सौभाग्य और पुण्य का कार्य माना जाता है।

महाकुंभ: श्रद्धा, संस्कृति और एकता का संगम

महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध संस्कृति और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। यह पर्व दुनिया भर के श्रद्धालुओं को एकजुट करता है और मानवता को धर्म, आस्था, और भाईचारे का संदेश देता है।

2025 के महाकुंभ में भी करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। प्रशासन ने इस महोत्सव के सफल आयोजन के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं ताकि हर श्रद्धालु को सुरक्षित और सुव्यवस्थित अनुभव मिल सके।

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