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देश की दूसरे नंबर की यूनिवर्सिटी JNU में ये क्या हुआ, प्रॉपर्टी किराए पर देने की नौबत कैसे आई?
Sunday, February 8, 2026
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देश की दूसरे नंबर की यूनिवर्सिटी JNU में ये क्या हुआ, प्रॉपर्टी किराए पर देने की नौबत कैसे आई?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) विवादों और विभिन्न लेबलों के अलावा, विश्वविद्यालय अपनी पढ़ाई, महत्वपूर्ण पदों पर अपने छात्रों और अपने मजबूत अकादमिक रिकॉर्ड के लिए भी प्रसिद्ध है। पिछले कई सालों से यह शिक्षा मंत्रालय की रैंकिंग में शीर्ष तीन में बना हुआ है। इस साल भी यह नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) में बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के बाद दूसरे नंबर पर आया। लेकिन इतना प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित संस्थान वित्तीय संकट से जूझ रहा है। खबर है कि विश्वविद्यालय अपनी कुछ संपत्तियों को बेचने या किराए पर देने की योजना बना रहा है।

क्या JNU काम नहीं कर पा रहा है?

विश्वविद्यालय भारी वित्तीय संकट से जूझ रहा है और प्रशासन ने दो संपत्तियों को बेचने का फैसला किया है। गोमती गेस्ट हाउस और 35 फिरोज शाह रोड। इसके अलावा शिक्षा मंत्रालय को एक पत्र लिखने की भी योजना है, जिसमें अनुरोध किया जाएगा कि परिसर में बने 12 राष्ट्रीय संस्थान उन्हें किराया दें।

जेएनयू की कुलपति शांतिश्री डी पंडित ने भी कहा कि विश्वविद्यालय इस समय भारी आर्थिक दबाव से गुजर रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार ने हर चीज पर सब्सिडी दे दी है। इसलिए कोई आय नहीं हो रही है। कुलपति ने कहा है, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) 11 अगस्त से कैंपस के साबरमती टी-पॉइंट पर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। उनका आरोप है कि प्रशासन महीनों से उनकी कई मांगों को नजरअंदाज कर रहा है। संघ की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है।

19 अगस्त को दो छात्र बीमार भी पड़ गए और उन्हें दिल्ली के एम्स में भर्ती कराना पड़ा। कई मुद्दों के साथ ही छात्र संघ फंड जुटाने और संपत्ति बेचने/किराए पर देने के खिलाफ भी विरोध कर रहा है। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए एक छात्र ने आरोप लगाया कि प्रशासन फंड जुटाने के लिए गोमती गेस्ट हाउस को बेचने जा रहा है। इसके बाद और भी हिस्से और इमारतें व्यावसायिक हितों के लिए किराए पर दी जा सकती हैं। जुलाई में पुणे के एक आरटीआई कार्यकर्ता ने जानकारी मांगी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कार्यकाल और उससे पहले के दशक में विश्वविद्यालय को कितनी सब्सिडी दी गई। आरटीआई के जवाब से पता चला है कि मौजूदा सरकार में यूनिवर्सिटी को सबसे ज़्यादा फंडिंग मिली है।

हालांकि, इसी RTI से यह भी पता चला है कि एक तरफ़ फंड बढ़ रहा है, साथ ही साथ FIR भी बढ़ रही हैं, जिस यूनिवर्सिटी में 2016 से पहले कोई FIR दर्ज नहीं हुई थी, उसके बाद प्रशासन ने अपने ही छात्रों के ख़िलाफ़ 35 FIR दर्ज कर ली हैं।

निम्न आय वर्ग के छात्रों को दिए जाने वाले 2000 रुपये भत्ते (एनसीएम) में 12 साल से कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है, छात्रों की मांग है कि इसे आज की महंगाई के हिसाब से बढ़ाकर 5000 रुपये किया जाए।

कैंपस में एक छात्रावास बनकर तैयार है, गृह मंत्री अमित शाह ने फरवरी महीने में इसका उद्घाटन किया था, लेकिन अभी तक इसे शुरू नहीं किया गया है।

छात्र कैंपस से बाहर रहने को मजबूर हैं।

विश्वविद्यालय में यौन उत्पीड़न के लगातार मामले सामने आ रहे हैं। हाल के वर्षों में इनमें बढ़ोतरी हुई है। छात्रों ने इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया। लेकिन आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। मांग है कि इस निकाय में छात्रों का भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पहले JNU में एक निकाय था, जिसमें छात्रों का भी प्रतिनिधित्व होता था और वे सिर्फ शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करते थे। वे अलग-अलग तरह के कार्यक्रम चलाते थे, जिससे कैंपस लैंगिक रूप से संवेदनशील हो जाता था।

परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था NTA सवालों के घेरे में है। लगातार पेपर लीक के मामले सामने आ रहे हैं। NTA JNU के लिए प्रवेश परीक्षा भी आयोजित करता है। छात्रों का कहना है कि NTA को इस जिम्मेदारी से मुक्त किया जाना चाहिए और प्रवेश परीक्षा (JNU-EE) उसी तरह आयोजित की जानी चाहिए, जैसे पहले आयोजित की जाती थी।

पिछले दिसंबर में विश्वविद्यालय प्रशासन ने विरोध प्रदर्शन के खिलाफ नए नियम जारी किए थे। नियम के मुताबिक विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों को 20,000 रुपये तक का जुर्माना देना पड़ सकता है। संघ की मांग है कि विरोध प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा के लिए इन दिशा-निर्देशों को निरस्त किया जाए।

इन मांगों के अलावा छात्र संघ अध्यक्ष ने द लल्लनटॉप को बताया कि छात्र फंड में कटौती का भी विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अंतरिम बजट में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के फंड में कटौती की गई। 2023-24 में ₹6,409 करोड़ के बजट को 2024-25 में 61% घटाकर ₹2,500 करोड़ कर दिया गया। नतीजतन, जेएनयू जैसे सरकारी विश्वविद्यालय को चलाने के लिए निजी निवेशकों को ढूंढना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि कुलपति ‘प्रॉपर्टी डीलर’ बन गए हैं।

हालांकि, विश्वविद्यालय के सूत्रों के हवाले से कई मीडिया रिपोर्ट्स में इन दावों को खारिज किया गया है। उन्होंने कहा कि जेएनयू में कोई निजीकरण नहीं हो रहा है।

मालूम हो कि छात्र संघ दो दिवसीय कैंपस कैंपस का आयोजन करेगा।

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