Saturday, February 7, 2026
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UP News : माघ मेला 2026 में पंचकोसी परिक्रमा का शुभारंभ, कई साधु-संतों ने निभाई सनातन परंपरा

प्रयागराज की सनातन परंपरा, गहरी आस्था और सांस्कृतिक विरासत की पहचान मानी जाने वाली पंचकोसी परिक्रमा का शुभारंभ माघ मेले के दौरान हो गया है। सोमवार को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के नेतृत्व में संगम तट पर विधिवत गंगा पूजन के साथ इस पावन परिक्रमा की शुरुआत की गई। यह धार्मिक यात्रा कुल पांच दिनों तक चलेगी, जिसका समापन अंतिम दिन साधु-संतों के लिए आयोजित भंडारे के साथ होगा।

परिक्रमा के दौरान माघ मेला प्रशासन को यातायात व्यवस्था और सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। संगम में गंगा पूजन संपन्न होने के बाद साधु-संतों का जत्था अक्षयवट और आदि शंकर विमान मंडपम मंदिर के दर्शन के लिए गया। इसके साथ ही पंचकोसी परिक्रमा के पहले दिन की यात्रा पूर्ण हुई।

पंचकोसी परिक्रमा प्रयागराज की अत्यंत प्राचीन परंपरा

पंचकोसी परिक्रमा प्रयागराज की अत्यंत प्राचीन धार्मिक परंपराओं में से एक मानी जाती है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि के अनुसार, इस परिक्रमा की अवधारणा प्रयाग मंडल के उस पारंपरिक भूगोल से जुड़ी है, जिसे पांच योजन और बीस कोस में विस्तारित माना गया है। गंगा, यमुना और सरस्वती के छह पावन तटों को मिलाकर तीन पवित्र अंतर्वेदियां बनाई गई हैं-अंतर्वेदी, मध्य वेदी और बहिर्वेदी।

इन तीनों वेदियों के अंतर्गत अनेक तीर्थ स्थल, उपतीर्थ और आश्रम स्थित हैं, जिनकी परिक्रमा पंचकोसी यात्रा में सम्मिलित है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु प्रयाग क्षेत्र में पंचकोसी परिक्रमा करता है, उसे यहां विराजमान सभी देवस्थलों, आश्रमों, मंदिरों, मठों और पवित्र जलकुंडों के दर्शन का पुण्य फल प्राप्त होता है, जिसे अक्षय माना गया है।

556 वर्षों बाद पुनर्जीवित हुई परंपरा

दिव्य और भव्य माघ मेले में कल्पवास के साथ-साथ पंचकोसी परिक्रमा भी एक अहम परंपरा रही है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी के अनुसार, यह परिक्रमा माघ मेले का अभिन्न हिस्सा थी, लेकिन करीब 556 वर्ष पहले मुगल शासक अकबर के शासनकाल में इस परंपरा पर रोक लगा दी गई थी।

लंबे समय तक बंद रहने के बाद साधु-संतों की निरंतर मांग और प्रयासों के चलते वर्ष 2019 में योगी सरकार के सहयोग से पंचकोसी परिक्रमा को फिर से शुरू किया गया। तब से यह परंपरा नियमित रूप से निभाई जा रही है और श्रद्धालुओं के लिए आस्था और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।

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