Saturday, February 7, 2026
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Uttarakhand : आज बंद होंगे बद्रीनाथ धाम के कपाट, दर्शन को उमड़ी श्रद्धालुओं की भारी भीड़…

उत्तराखंड की ऊँची बर्फीली पर्वत-श्रृंखलाओं के बीच स्थित बद्रीनाथ धाम में इस वर्ष विवाह पंचमी का दिन विशेष महत्व लेकर आया है। आज इसी शुभ अवसर पर भगवान बद्रीनाथ के कपाट शीतकाल के लिए औपचारिक रूप से बंद किए जाएंगे। हर वर्ष की परंपरा की तरह इस बार भी कपाट बंद होने से पहले धाम में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है, क्योंकि यह मान्यता है कि कपाट बंद होने से ठीक पहले किए गए दर्शन अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। सोमवार को पंच पूजा के चौथे दिन मां लक्ष्मी मंदिर में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए गए। परंपरानुसार कढ़ाई प्रसाद अर्पित करने के उपरांत माता लक्ष्मी को बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान होने का निमंत्रण दिया गया।

आज दोपहर से कपाट होंगे बंद

आज दोपहर 2 बजकर 56 मिनट पर कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए जाएंगे, जिसके साथ ही बद्रीनाथ धाम का छह महीने लंबा शीतकाल प्रारंभ हो जाएगा। इस पावन क्षण को देखते हुए मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है—रंगों से सुसज्जित रोशनी, ताज़े पुष्पों की सुगंध और आध्यात्मिक वातावरण पूरे धाम को एक दिव्य आभा प्रदान कर रहा है। शीतकाल के दौरान भगवान बद्रीनाथ की पूजा जोशीमठ में संपन्न की जाती है।

मोक्ष के मार्ग का आखिरी द्वार

21 नवंबर से बद्रीनाथ में पंच पूजाओं का क्रम शुरू हो गया था। इसके तहत गणेश मंदिर, आदि केदारेश्वर और आदि गुरु शंकराचार्य गद्दी स्थल के कपाट भी पूरी विधि-विधान से बंद किए गए। जैसे-जैसे कपाट बंद होने का समय नजदीक आता गया, वेद मंत्रों का पाठ भी पूर्ण किया गया। यमुनोत्री, गंगोत्री और केदारनाथ के बाद बद्रीनाथ को मोक्ष के मार्ग का आखिरी द्वार माना जाता है, जो चारधाम यात्रा का चरम चरण है।

सोमवार सुबह मुख्य पुजारी अमरनाथ नंबूदरी माता लक्ष्मी को आमंत्रित करने के लिए उनके मंदिर पहुंचे और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें गर्भगृह में स्थापित किए जाने की परंपरागत प्रक्रिया निभाई। इसके साथ ही मंदिर में कपाट बंद करने की अंतिम तैयारियाँ शुरू कर दी गईं।

गर्मियों में मां लक्ष्मी रहती हैं विराजमान

मुख्य पुजारी द्वारा माता लक्ष्मी को गर्भगृह में विराजमान होने का आमंत्रण देना इस पूरे अनुष्ठान का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। गर्मियों में माता लक्ष्मी अपने मंदिर में विराजित रहती हैं, जबकि सर्दियों में वे बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में निवास करती हैं। कपाट बंद होने से पहले भक्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और लोग इस आध्यात्मिक एवं भावुक कर देने वाली परंपरा के साक्षी बनना चाहते हैं।

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कपाट बंद होने के बाद भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति पारंपरिक नियमों के अनुसार जोशीमठ ले जाई जाती है, जहाँ पूरे शीतकाल पूजा-अर्चना का क्रम चलता है। इस दौरान धाम पर बर्फ की मोटी परत जम जाती है। आने वाली गर्मियों में दोबारा कपाट खुलते हैं और चारधाम यात्रा नई शुरुआत के साथ आरंभ होती है।

आस्था और शांति का केंद्र

भगवान विष्णु के बद्री-नारायण स्वरूप को समर्पित यह धाम लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और शांति का केंद्र है। मान्यता है कि यहां के दर्शन से मन को समाधान, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। बर्फीली हवाओं, अलकनंदा नदी की पवित्र धारा और प्रकृति की निर्मल शांति से घिरा बद्रीनाथ धाम हर भक्त के लिए एक अनूठा और दिव्य अनुभव बन जाता है।

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